Thursday, July 15, 2010

आनर किलिंग

आज से कुछ समय पहले की बात है एक व्यक्ति की जवान लड़की किसी लडके के साथ चली गई, तब उसके पिता ने कहा कि मेरे परिवार पर आज तक कोई दाग नहीं था, किन्तु इस लड़की ने मुझे गाँव व क्षेत्र मा मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, अब मैं किस मुंह से घर से बाहर निकलूं, बतातें कि १०-१५ दिन के बाद उसकी अर्थी ही बाहर निकली ! किन्तु अब समय बदल गया है और नए बुद्धिजीवी और तथा कथित समाज सुधारक लोग, इन बातों पर मर मिटने को झूंटी शान कहते हैं, मैं इन लोगों से यह जरूर जानना चाहता हूँ कि फिर सच्ची शान कोनसी है !  क्या रिश्वत से गरीबों का खून चूस कर बड़े बड़े महल और भारी भरकम नामी और बेनामी सम्पति अर्जित करना ही सच्ची  शान है, क्या चुनाव जीतकर अपनी सम्पति में हजारों गुना इजाफा करना ही सच्ची शान है, क्या उद्योगों से कर चोरी करके व मजदूरों का सस्ता श्रम लेकर अकूत धन दौलत इकट्ठी करना ही सच्ची शान है !एक गरीब आदमी के बच्चे  को उठाकर उसके अंगों की तस्करी  करना, फिर भी पुलिस उसकी रिपोर्ट न लिखे और एक उच्च पदस्त अधिकारी के कुत्ते खो जाने पर वहां की पुलिस पूरे सूबे की खाक छानती फिरे , और अपना कुत्ता तलास करना ही  क्या उन लोगों की सच्ची शान है, क्या जान-पूछकर जन्म से पहले ही कन्याओं की हत्या करना ही सच्ची शान है! नई दिल्ली की किसी भी पास कालोनी का सर्वे कराकर देख लीजिये वहां का लिंग अनुपात निरंतर गिरता ही चला जा रहा है, क्योंकि इन कोलोनियों मैं सच्ची शान वाले लोग निवास करते हैं ! आज भी अधिकांश स्कूलों में जो प्रार्थना बोली जाती है , उसकी एक पंक्ति है " निज आन मान मर्यादा का प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे"! मैं पुनः उन बुद्धिजीवियों से यह जानना चाहता हूँ कि आखिर वे कोनसी मर्यादाएं हैं जिनका कि इस ईश बंदना में भी जिक्र किया गया है ! क्या वे कानूनी मर्यादाएं हैं या सामाजिक मर्यादाएं!      

Saturday, June 26, 2010

कल्याणकारी कार्यक्रमों से गरीबी बढती है

बजट के कल्याणकारी कार्यक्रमों से धनी व संपन्न वर्ग के पास अधिक पैसा पहुँचता है  ! जितने भी सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रम हैं वे सभी गरीव , निर्धन , वेसहरा लोंगों के लिए संचालित किये जाते हैं किन्तु उनका लाभ हमेशा संपन्न वर्ग ही उठाता है! जब भी देश के वित्त मंत्री गरीब , मजदूर , किसान व वेसहरा लोग के कल्याण के लिए किसी भी योजना कि घोषणा करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि इस बार तो एन लोग की सूखी हड्डियों में कुछ तो रक्त का संचार होगा ही, लेकिन होता वही है लो पहले से होता चला आ रहा है! इसका सीधा सा अभिप्राय शीर्स पर विराजमान लोग के कथनों से इस प्रकार निकला जा सकता है! पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी से लेकर कांग्रेस की नैया के खेवनहार राहुल गाँधी तक ने यही कहा है कि जब हम ऊपर से १०० पैसा भेजते हैं तो वह मूल व्यक्ति या लाभार्थी तक पहुँचते पहुंचते मात्र १५ पैसा ही रह जाता है ! इससे स्पष्ट है कि ८५ पैसा कहीं न कहीं भ्रष्टाचार कि भेंट चढ़ जाता है! अब आप  उन्ही के अर्थशास्त्र से स्वयं ही हिसाब लगा लीजीए कि किसी भी कल्याणकारी योजना के लिए १०० पैसे तो जनता से ही इकट्ठा किये जाते हैं ! यहाँ अगर हम उच्च वर्ग व उच्च मध्य वर्ग को अधिकतम कुल जनसँख्या का २० प्रतिशत मान लें और आम जनता को ८० प्रतिशत माने! जब कि टेक्स तो हर व्यक्ति देता है , अगर कोई कारखाने वाला है तो वह टैक्स को उत्पादन पर ही डाल देता है, जिसका भुकतान आम उपभोक्ता को ही करना पड़ता है! अतः गरीब व उन लोगों को, जिनके लिए योजना चलाई जा रही है उनका अंशदान तो हुआ ८० पैसे तथा उन्हें मिले मात्र १५ पैसे ! अतः जब तक हमारी सरकार इन ८५ पैसों को खोजकर सही जगह पर नहीं पहुँचाती, तब तक सरकार क़ी सभी कल्याणकारी योजनायें बेमानी साबित होंगी !  

Wednesday, June 2, 2010

जातीय जनगणना का विरोध क्यों

कुछ दिनों से जातीय आधार पर की जाने वाली जनगणना का विरोध मीडिया एवं समाचार पत्रों में किसी न किसी रूप में छाया हुआ है ! इनलोगों की बेतुकी बातों से ऐसा आभास होता है कि अगर देश की जनगणना जातीय आधार पर की गई तो देश का बहुत बड़ा अनर्थ हो जायेगा ! ऐसा नहीं है कि ये लोग जाति विहीन समाज की संकल्पना में विश्वास रखते हों बल्कि ये एक सोची समझी रणनीति के तहद राजनीतिक विचारधारा से किया जा रहा प्रोपेगंडा है ! पहले तो मैं इन लोगों को यह बता देना चाहता हूँ कि कोई भी देश या राष्ट्र कभी भी जातियों के आधार पर विभाजित नहीं हुआ या हो सकता है , बल्कि देश , राष्ट्र यहाँ तक कि राज्य का विभाजन या मांग धर्म या भाषा के आधार हो सकती है ! अगर ये लोग जाति विहीन समाज की संरचना चाहते हैं , तो इन्हें सर्व प्रथम यह बात रखनी चाहिए थी कि स्कूलों या कहीं भी और किसी भी जगह जाति का कोई भी कालम ही नहीं होना चाहिए , और जब जाति का कोई भी कालम ही नहीं होगा तो बहुत सारी समस्याएं तो स्वतः ही हल हो जाएँगी ! जब अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जातियों की गणना से कोई पहाड़ नहीं गिरा तो पिछड़ी जातियों की गणना से ही कौनसा बज्रपात होंने वाला है ! हमारे यहाँ पर सेवाओं के क्षेत्र में हो पंचायती राज संस्थाओं में प्रतिनिधि चुनने में , सभी में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है , और इन पिछड़े वर्ग की जातियों को आरक्षण २७ प्रतिशत इस आधार पर दिया गया था की १९३१ की जनगणना या सर्वे में उनकी जनसँख्या ५४ प्रतिशत थी ! जरा विचार कीजिये की ८० वर्ष पुराने उन आंकड़ों पर कैसे विस्वास कर लिया जाय , जब भारत , पाकिस्तान और बंगला देश एक ही थे ! अब यह भी तो कहा जा सकता है की अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी ही २६ प्रतिशत है , तो फिर आप उन्हें २७ प्रतिशत आरक्षण क्यों दे रहे हो ! जब आपके पास कोई विस्वसनीय आंकडे ही नहीं हैं तो फिर आप किस आधार पर आरक्षण दे रहे हो !

Tuesday, May 25, 2010

खाप पंचायत वनाम मीडिया

कुछ समय से प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया सभी मैं खाप पंचायतों को एक तरह से खलनायक की भूमिका मैं प्रस्तुत किया जा रहा है! शहर के वातानुकूलित कमरों में बैठे हुए वे बुद्धिजीवी जिनका ग्रामीण परिवेश से कोसों तक का कोई रिश्ता नहीं होगा तथा आधुनिक शहरी रीति रिवाजों एवं पाष्चात्य सभ्यता के आधार पर एक विशेष जाति के सगोत्र विवाहों एवं एक ही गाँव में विवाहों को अपनी बुद्धिमत्ता के आधार पर जायज ठहरा रहे हैं ! मैं उनसे मात्र इतना ही जानना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने कभी गाँव में रहकर उनकी रीति रिवाज एवं परम्पराओं को नजदीक से देखा है ! अगर देखा है तो वे बुद्धिजीवी उस जाति में एक साल में मात्र दस सगोत्र विवाह ( चाहे प्रेम विवाह हों या दूसरे ) ही गिनवा दें , और जब वे हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मिलाकर दस सगोत्र विवाह व गाँव से गाँव में विवाह नहीं गिनवा पायें तो उन्हें इस प्रकार की आलोचना करने का कोई भी अधिकार नहीं रह जाता है , इस समय मुझे किसी गाने की एक पंक्ति याद आ रही है कि " पायल के गुणों का इल्म नहीं , झंकार की बातें करते हैं " मैं उन बुद्धिजीवियों से एक वार पुनः आग्रह करना चाहता हूँ कि पहले वे उन गांवों में जाएँ और वहां रहकर उनकी रीति रिवाज व परम्पराओं तथा खाप पंचायतों के फैसलों को नजदीक से जाकर देखें और विचार करें कि इनमें क्या क्या बुराइयाँ और क्या क्या अच्छी बातें हैं , तब कहीं जाकर अपनी राय स्पष्ट करें ! इन खाप पंचायतों में उस वर्ग के बुद्धिजीवी , प्रतिष्टित तथा अनुभवी वे लोग जिन्हें उस वर्ग का भारी समर्थन प्राप्त होता है , किसी पीड़ित पक्ष के बुलाने पर इकट्ठा होते हैं और काफी विचार विमर्स के बाद ही किसी अंतिम फैसले पर पहुँचते हैं ! सगोत्र का सीधा सा अभिप्रायः है के दस बारह पीढियां पहले से वे सभी एक ही पूर्वज की संताने हैं , इस प्रकार विशाल ह्रदय से देखें तो वे सभी युवक / युवतियां आपस में भाई - बहन हुए और एक ही गाँव ( ओसतन २००-३०० परिवारों का समूह ) में रहने वाले सभी जातियों के युवक / युवतियां भी भाई - बहन ही हुए और हिन्दू धर्म में भाई - बहन की शादी होना कहाँ तक उचित है ! शहरी परिवेश की बात दूसरी है , वहां तो विभिन्न जाति , धर्म व परम्पराओं के लाखों लोग रहते हैं !

Monday, July 27, 2009

नेता / समाज सेवकों की सुरक्षा

हमारी सामाजिक व संवेधानिक व्यवस्था के अनुसार समाज अपने में से एक रहनुमा अर्थात एक नेता का चुनाव करता है जो कि उन्हें आगे की राह दिखाते हुए उनका पथ प्रदर्शक हो ! हर जागरूक सामाजिक नेता का फर्ज होता है कि वह अपने समाज की सुरक्षा करे , लेकिन उल्टे समाज के पैसे से ही आज उन पथ प्रदर्शक कहे जाने वाले नेताओं की सुरक्षा हो रही है ! जो नेता काली वर्दीधारी ब्लैक कैट कमांडो से घिरकर चलेगा वह अपने समाज की क्या सेवा व सुरक्षा करेगा बल्कि वह स्वयं ही समाज के द्वारा अपनी सुरक्षा करा रहा है ! पहले तो यह सोचने की बात है कि जब संविधान ने सभी लोगों को बरावर माना है तो फिर यह विशिष्ट व्यक्ति शब्द कहाँ से आ गया , दूसरी बात यह है कि जब यही विशिष्ट व्यक्ति आधी सुरक्षा को अपने ऊपर ले लेंगे तो आम जनता की सुरक्षा कैसे होगी और कोन करेगा ! देखा जाय तो ब्लेक कैट कमांडो के द्वारा उन लोगों की सुरक्षा नही होती बल्कि यह आज एक स्टेटस सिम्बल बन गया है ! क्या इंदिरा गाँधी , राजीव गाँधी और जनरल वैद्य जैसे लोगों की सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी थी , फिर भी उन लोगों की सुरक्षा नहीं हो पाई ! गृह मंत्रालय को चाहिए कि उसे उन विशिष्ट व्यक्तियों की पद के हिसाब से ( न कि नाम से ) एक सूची प्रकाशित करे और एक नियमावली भी बनाये , उसी आधार पर बिना किसी पक्षपात के उन लोगों को सुरक्षा प्रदान की जाय ! शायद ही हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी कल्पना की होगी कि कुछ लोग तो उस समय के राजा महाराजाओं से भी बेहतर सुख सुविधा युक्त राजसी ठाट वाट से भी बढ़कर जीवन जीयें , और कुछ लोग अपने पेट की खातिर दिन रात खून पसीना बहाते रहें !
सरकार को इन नेताओं व विशिष्ट व्यक्तिओं की सुरक्षा के लिए एक विशेष पुलिस बल का गठन करना चाहिए ताकि वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था आम जनता को मुहैया हो सके और जनता को यह भी पता चलता रहे की जिन लोगों को हमने अपनी सुरक्षा के लिए चुना था , अब उन्हीं लोगों के ऊपर गरीब जनता की खून पसीने

Saturday, June 13, 2009

हिंदुत्व एक जीवन पध्दति है !

हिंदुत्व किसी विशेष संप्रदाय या देश की सीमाओं में बंधा नहीं है , क्योकि यह अच्छे जीवन व आचार - विचार से जीवन जीने की एक पध्दति है ! हिंदुत्व में वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर अपनी जीवन शैली को निर्धारित करने की पूरी छूट है , तथा इसमें कट्टरवाद के लिए कोई भी स्थान नहीं है ! अगर मैं हिंदुत्व के अंदर ढोंग पाखंड , अंधविश्वास व अन्य बुराईयों की खुले तौर पर आलोचना करता हूँ और पाता हूँ कि ये नियम हमारी जीवन शैली के लिए वैज्ञानिक आधार पर खरे नहीं उतर रहे हैं मैं उन्हें त्याग कर भी हिंदुत्व के आधार पर अपनी जीवन पध्दति निर्धारित कर सकता हूँ ! हिंदुत्व में वे सभी मानवतावादी वैश्विक तत्व विद्यमान हैं जो सत्य और अहिंसा पर चलकर जीवन जीने कि राह दिखाते हैं ! हिंदुत्व किसी भी पूर्वाग्रह या संकीर्ण भावना से ग्रसित नहीं है , और न ही किसी संप्रदाय से बंधा हुआ है ! यह सभी धर्मों के वैज्ञानिक आधार पर सत्य के अभियान में पूर्ण रूप से सहभागी है ! गाँधी जी ने भी कहा था कि हिंदुत्व की परिधि में देश में रहने वाले सभी हिंदू , मुसलमान , सिक्ख व ईसाई अर्थात सभी वर्ग व समुदाय के लोग आते हैं ! आज हिंदुत्व के इस व्यापक अर्थ और अवधारणा से राजनैतिक क्षेत्र में प्रचलित अवधारणा मेल नहीं खाती, क्योंकि यह सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ आज भी बांटो और राज करो की नीति पर चल रहे हैं ! संरक्षणवाद, अल्पसंख्यकवाद तथा तुष्टिकरण की नीति सत्ता के गलियारों से ही निकलकर आज तथाकथित प्रगतिशील व सेकूलर कहे जाने वाले अलमबरदारों का आदर्श बनता जा रहा है , जो की भविष्य में देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा ! हिंदुत्व के विरुध्द विषवमन करना आज धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज्म की एक पहचान सी बन गई है , और ऐसे लोग अपने को प्रगतिशील विचारधारा के ठेकेदार कहलाने में जरा भी संकोच नहीं करते ! विचार सदैव मानव कल्याण या सेवा के लिए होते हैं , और सेवा के लिए राष्ट्र धर्म को सर्वोच्च बनाना होगा तभी राष्ट्रीय अस्मिता शास्वत रहेगी ! राष्ट्रीय अस्मिता तथा स्वाभिमान को जीवंत रखने के लिए राष्ट्रीय धर्म और राष्ट्रीय संस्कृति को सर्वोपरि मानकर ही चलना होगा !

Saturday, June 6, 2009

महिला आरक्षण, आख़िर क्यों ?

जिस प्रकार कोई जादूगर जब अपने पिटारे में कुछ करता है तो वह दर्शकों का ध्यान मुख्य बातों से हटाने के लिए उन्हें अपनी बातों में उलझा लेता है , बिल्कुल ठीक उसी प्रकार हमारी केंद्रीय सरकार देश के रग रग में व्याप्त भर्ष्टाचार एवं मूलभूत समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए महिला आरक्षण का पिटारा खोल देती है! अगर महिला आरक्षण से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार या किसी भी समस्या का समाधान हो जाय, तो महिला आरक्षण का बिल पास होने से देश का कल्याण हो जाएगा ! किंतु महिला आरक्षण शायद किसी भी सामाजिक व आर्थिक समस्या का कोई भी स्थाई व अस्थाई समाधान नहीं है ! अगर इससे किसी एक भी समस्या का हल सम्भव होता तो हमारे गाँव की ग्राम प्रधान महिला, ब्लाक प्रमुख महिला, जिला पंचायत की अध्यक्ष महिला, राज्य की मुख्य मंत्री महिला, लोक सभा की सदस्य महिला, लोक सभा की अध्यक्ष महिला, केन्द्र में शासित दल ( यू पी ऐ ) की चेयर परसन महिला और राष्ट्र के सर्वोच्च राष्ट्र पति के पद पर आसीन भी महिला होने से यहाँ पर कोई भी समस्या नहीं रहनी चाहिए! जब कि यहाँ पर किसी भी समस्या व भ्रष्टाचार में कोई भी कमी परिलक्षित नहीं हो रही है, तथा सामाजिक समरसता व आपसी भाईचारे में भी कोई बढोत्तरी नहीं दिखाई दे रही! अगर सरकार में सामाजिक भेदभाव मिटाने की दृढ इच्छा शक्ति है, तो उसे सर्व प्रथम देश से सभी सामाजिक बीमारियों की जड़ जातिवाद को ही समाप्त कर देना चाहिए, लेकिन प्रत्येक राजनेतिक दल व सरकारें अपनी राजनेतिक रोटियां सेकने तथा अपना उल्लू सीधा करने के लिए हमेशा ही जातिवाद व समाज में भेदभाव को बढ़ाने में अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर ही कार्य करते देखे गए हैं! इस पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की देश में सामाजिक समरसता व भेदभाव मिटाने के लिए स्कूल व अन्य सभी स्थानों पर व्यक्ति की जाति लिखना ही बंद करा दिया जाय तो निशचित रूप से १० से १५ वर्षों में भारतीय समाज से ९० प्रतिशत जातीयता का अभिशाप समाप्त हो जाएगा! महिला आरक्षण कोई अलाउद्दीन का चिराग तो है नहीं की उसे लागू करते ही सभी समस्याओं का समाधान भले ही न हो किंतु कुछ समस्याओ का निराकरण तो हो ही जाय! अगर सभी दल महिलाओं को आरक्षण देने के पक्षधर हैं , तो राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर के मान्यता प्राप्त सभी दलों को निर्वाचन आयोग की यह बात मान लेनी चाहिए थी , की वे ३३ प्रतिशत महिलाओं को टिकिट दें! लेकिन अभी सम्पन्न हुए लोक सभा के चुनावों में क्या किसी दल ने इसे लागू किया, शायद नहीं, फिर क्यों यह बात हर बार उठाई जाती, है की महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए! अतः कोई भी राजनेतिक दल ३३ प्रतिशत महिलाओं को टिकिट देने की अनिवार्यता का संविधान संशोधन बिल क्यों पेश नहीं करता! अंत में मैं यही कहूँगा की अधिकांश राजनेतिक दल चाहते हैं की इसका वजन भी गरीव जनता के कन्धों पर ही डाला जाय, और संसद में ३३ प्रतिशत सीटें बढाकर महिलाओं को आरक्षण दे दिया जाय! इससे उन बढे हुए सदस्यों के लिए वेतन , भत्ते , आवास एवं अन्य सुविधाओं पर होने वाले करोड़ों, अरबों रुपयों का भार तो फिर भी गरीब जनता के ही खून पसीने की कमाई से ही जाएगा ! क्या कोई भी पुरूष सांसद स्वेच्छा से यह चाहेगा की उसकी लोकसभा की सीट महिला के लिए आरक्षित कर दी जाय! शरद यादव व मुलायम सिंह जैसे कुछ सांसद हैं , जो अपने दल के सर्वे सर्वा हैं , और अपनी अंतरात्मा की आवाज को सदन के अंदर या बाहर खुले दिल से कह सकते हैं! परन्तु क्या कांग्रेस या बीजेपी में से कोई भी सांसद अपने अंदर की आवाज को खुल कर कह सकता है या उसे ऐसा कहने की आजादी है, शायद नहीं! अगर कोई अपनी अन्तर आत्मा की आवाज पर कहने की हिम्मत भी करेगा तो उस पर दलगत नीतियों के विरुध्द कार्य करने का आरोप लगा दिया जाएगा , और उसकी सदस्यता भी खतरे में पड़ सकती है ! अगर सरकार चाहती है की जनतान्त्रिक तरीके से महिला आरक्षण बिल को बगैर ३३ प्रतिशत सीटें बढाये पास कराया जाय , तो उसे चाहिए की बिना किसी पार्टी ह्विप के एवं गोपनीय तरीके से तथा अंतर्रात्मा की आवाज पर मतदान कराया जाय ! किंतु हमारे यहाँ कहने को प्रजातंत्र है और बात सरकार में शीर्ष पदों पर आसीन कुछ ही लोगों की चलती है, और जो वह चाहते हैं उसे पार्टी ह्विप के द्वारा पास करा लेते हैं ! अगर आरक्षण देना ही है तो किसानों को दो , मजदूरों को दो , ग़रीबों को दो , जो की अपनी बात को संसद में सही ढंग से उठा सकें! आज संसद एवं विधान मंडलों में व उच्च पदों पर आसीन महिलाएं आरक्षण के बल पर तो नहीं आई, बल्कि स्वयं अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर कर ही तो इस मुकाम पर पहुँची हैं, और जो आरक्षण के बल पर पंचायत एवं स्थानीय निकायों में महिलाएं निर्वाचित होकर अपने पदों पर विराजमान हैं , अधिकांश में उनका कार्य उनके पति या बेटे ही देख रहे हैं ! अतः किसी भी आरक्षण रुपी नैया पर बैठ कर कभी भी वैतरिणी पार नहीं की जा सकती है !