Wednesday, November 2, 2011

Digvijay

दिगविजय सिंह ke   प्रवचन

Thursday, January 27, 2011

भ्रष्टाचार से आर्थिक असमानताएं चरम पर

मुम्बई के एक उद्दोगपति ने ४५०० करोड़ रुपये की लागत  से अपने रहने के लिए एक मकान बनवाया  है और महात्मा गाँधी ने सन १९३६ में मध्य भारत के एक छोटे से ग्राम सेवाग्राम (वर्धा, महाराष्ट्र) में अपने रहने के लिए एक कुटिया इस शर्त पर बनवाई थी कि इसकी कुल लागत एक सौ रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए, और उसी कुटिया में अपने जीवन के महत्वपूर्ण दस वर्ष गुजारे ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन को  पूर्ण रूप से दिशा देने के साथ साथ राष्ट्र उत्थान के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण बुलंदियां हांसिल करते रहे और उसी छोटी सी कुटिया में रहते हुए  दुनियां की सबसे बड़ी ताकत से राष्ट्र को आजाद कराया !कल्पना कीजिये कि "जिस तरह से देश में आज  विकास वृद्धि- दर का आंकलन बिना मंहगाई को लगाये किया जाता है" उसी हिसाब से गाँधी जैसी ४५ करोड़ कुटियाएँ  उस एक व्यक्ति के भवन की लागत से बनाई जा सकती हैं , जिसमें देश के हर दो से तीन व्यक्तियों  के रहने के लिए  गाँधी जैसी कुटियाएँ काफी होंगी !  दूसरी तरफ भ्रष्टाचार का खेल देखिये कि जिस २ जी स्पैक्ट्रम के आवंटन  में  राष्ट्र को १.७६ लाख करोड़ रुपये का चूना लगाया गया, उसी धनराशि से १७ से १८ लाख रुपये की लागत से १० लाख  प्राइमरी विद्यालय बन जायेंगे, जो कि देश के छै: लाख गावों के साथ साथ हर छोटे बड़े पुरवे में एक बन जायेगा, या  १७६ लाख रुपये की लागत से पूरे देश में एक लाख अस्पताल बन जायेंगे,  अतः इस एक मकान की लागत में संपूर्ण देश में हर छै: गांवों के मध्य एक अस्पताल बन जायेगा! पहले जब हम प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे तो इतिहास में पढाया जाता था कि हमारा देश सोने की चिड़िया थी जिसे विदेसी आक्रान्ता एवं अंग्रेज लूटकर ले गए , किन्तु विडंबना  देखिये कि आज  अपने ही देश के काले अंग्रेज देश के धन को लूटकर विदेशी बैंकों में जमा कर रहे हैं! एक अनुमान के अनुसार हमारे देश के भ्रष्ट एवं बेईमान काले अंग्रेजों का विदेशी बैंकों में १४०० अरब डालर तक की काली कमाई की धनराशि जमा है ! १४०० अरब डालर का मतलब ६३००० अरब रुपये !इस समय अगर हम देश की कुल जनसँख्या १२६ करोड़ मानकर चलें तो प्रति व्यक्ति (आज जन्म लेने वाला नवजात शिशु भी ) के हिस्से में ५० हजार रुपये आ जायेंगे !यह है भारतीय जनतंत्र का हाल,यहाँ पर जन  तो केवल पाँच वर्ष में एक वार ही वोट डालने के लिए  आता   है और तंत्र पूरे पाँच वर्ष अपना खेल खेलता रहता है! जरा इनके विषय में सोचिये कि इन लोगों की सोच और मानसिक स्टार कैसा होगा जो  किसान,मजदूर एवं देश के  गरीब मेहनतकश लोगों के खून पसीने की  गाढ़ी  कमाई को यह चोर उचक्कों से भी गए गुजरे भ्रष्टतम  लोग अपनी काली करतूतों के रूप में विदेशी बैंकों में जमा करने में जरा भी शर्म महशूस नहीं करते ! इस भ्रष्टाचार के कारण ही देश में आर्थिक विषमतायें दिनों दिन बढ़ती ही जा रही हैं , एक तरफ देश की बहुसंख्यक आबादी २० रुपये प्रतिदिन पर गुजर करने को मजबूर है , किसान आत्म हत्याएं कर रहा है! गरीबी का आलम यह है कि लोग विवश होकर व्यवस्था (तंत्र ) के विरुद्ध हतियार उठाने को मजबूर हो रहे हैं, कहावत है  कि "मरता सो क्या न करता" ! आज जो लोग व्यवस्था के इन अत्याचारों का विरोध करते हैं, उन्हें नक्सली करार  देकर  फर्जी मुठभेड़ों में मर गिराया जाता है या फिर सामाजिक कार्यकर्त्ता विनायक सेन की तरह जेल में डाल दिया जायेगा और अगर कुछ कहा भी तो अरुंधती राय की तरह देश द्रोह का मुकद्दमा चलाया जायेगा !